Episode 2 : कुल्लू का इतिहास History Of Kullu
कुल्लू का इतिहास History Of Kullu
कुल्लू (Kullu)
जिले के रूप में गठन 1963, जिला मुख्यालय कुल्लू है | कुल्लू का कुल क्षेत्रफल 5503 वर्ग किलोमीटर है | कुल्लू हिमाचल प्रदेश के मध्य भाग में स्थित जिला है | कुल्लू के उत्तर में और उत्तर पूर्व में लाहौल स्पीति, पूर्व में किन्नौर, दक्षिण में शिमला, पश्चिम और दक्षिण में मंडी और उत्तर पश्चिम में काँगड़ा जिला स्थित है |
इतिहास
पाल वंश
- कुल्लू रियासत की स्थापना - कुल्लू का पौराणिक ग्रंथों में 'कुल्लुत देश, के नाम से वर्णन मिलता है | रामायण,विष्णुपुराण,महाभारत,मार्कडेंय पुराण, वृहस्तसंहिता पर कल्हण की राजतरंगिणी में 'कुल्लुत' का वर्णन मिलता है | कुल्लू घाटी को कुलंतपीठ भी कहा गया है क्यूंकि इसे रहने योग्य संसार कहा गया है | कुल्लू रियासत की स्थापना विहंगमनीपाल ने हरिद्वार से आकर की थी | विहंगमनीपाल के पूर्वज इलाहाबाद से अल्मोड़ा और हरिद्वार आकर बस गए| विहंगमनीपाल स्थानीय जागीरदारों से पराजित होकर प्रारम्भ में जगतसुख के चपाईराम के घर रहने लगे | भगवती हिडिम्बा देवी के आशीर्वाद से विहंगमनीपाल ने रियासत की पहली राजधानी जगतसुख स्थापित की | विहंगमनीपाल के पुत्र पछ्पाल ने 'गजन' और 'बेवला' के राजा को हराया |
- कुल्लू रियासत की 7 बजीरियां
- परोल बजीरी (कुल्लू)
- बजीरी रूपी (पार्वत और सैंज खड्ड के बीच)
- बजीरी लग महाराज (सरवरी और सुल्तानपुर से बजौरा तक)
- बजीरी भंगाल
- बजीरी लाहौल
- बजीरी लग सारी (फोजल और सरवरी खड्ड के बीच)
- बजीरी सिराज (सिराज को जलौरी दर्रा दो भागों में बांटता है)
- महाभारत काल - कुल्लू रियासत की कुल देवी हिडिम्बा ने भीम से विवाह किया था | घटोतकच भीं और हिडिम्बा का पुत्र था जिसने महाभारत युद्ध में भाग लिया था | हिडिम्बा (टांडी)का वध किया था जो देवी राक्षसी का भाई था |
- हेनसांग का विवरण - चीनी यात्री हेनसांग ने 635 ई० में कुल्लू रियासत की यात्रा की | उन्होंने कुल्लू रियासत की परिधि 800 किलोमीटर बताई जो जालंधर से 187 किलोमीटर दूर स्थित था | भगवान बुद्ध की याद में अशोक ने कुल्लू में बौद्ध स्तूप बनवाया |
- विसूदपाल -नग्गर के राजा करमचंद को युद्ध में हराकर विसूदपाल ने कुल्लू की राजधानी जगतसुख से नग्गर स्थानांतरित की |
- रुद्रपाल और प्रसिद्धपाल - रुद्रपाल के शासनकाल में स्पीति के राजा राजेंद्र सेन ने कुल्लू पर आक्रमण करके उसे नरजना देने के लिए विवश किया | प्रसिद्धपाल ने स्पीति के राजा छतसेन से कुल्लू और चम्बा के राजा से लाहौल को आज़ाद करवाया |
- दतेश्वर पाल - दतेश्वर पाल के समय चम्बा के राजा मेरुवर्मन (680-700 ई०) ने कुल्लू पर आक्रमण कर दतेश्वर पाल को हराया और वह इस युद्ध में मारा गया | दतेश्वर पाल 'पालवंश' का 31वां राजा था |
- जारेशवर पाल (780-800 ई०) - जारेशवरपाल ने बुशहर रियासत की सहायता से कुल्लू और चम्बा से मुक्त करवाया |
- भूपपाल - कुल्लू के 43वें राजा भूपपाल सुकेत राज्य के संस्थापक वीरसेन के समकालीन थे | वीरसेन ने सिराज में भूपपाल को हराकर उसे बंदी बनाया |
- पड़ोसी राज्य के पाल वंश पर आक्रमण - हस्तपाल -2 के समय बुशहर, नरिंदर पाल के समय बंगाहल,नन्द्पाल के समय काँगड़ा, केरल पाल के समय सुकेत ने कुल्लू पर आकर्मण कर कब्जा किया और नजराना देने के मजबूर किया |
- उर्दान पाल (1418-1428 ई०)- पाल वंश के 72वें राजा उर्दान पालमें जगतसुख में संध्या देवी का मंदिर बनवाया |
- पाल वंश का अंतिम शासक - कैलाश पाल (1428-1450 ई०) कुल्लू का अंतिम राजा था |
कैलाश पाल के बाद के 50 वर्षों के अधिकतर समय में कुल्लू सुकेत रियासत के अधीन रहा | वर्ष 1500 ई० में सिद्ध सिंह बदानी वंश की स्थापना की | उन्होंने जगतसुख को अपनी राजधानी बनाया |
- बहादुर सिंह (1532 ई०) - बहादुर सिंह सुकेत के राजा अर्जुन सेन का समकालीन था | बहादुर सिंह ने बजीरी रूपी को कुल्लू राज्य का भाग बनाया | बहादुर सिंह ने मकरसा में अपने लिए महल बनवाया | मकरसा की स्थापना महाभारत के विदुर के पुत्र मकस ने की थी | राज्य की राजधानी उस समय नग्गर थी | बहादुर सिंह ने अपने पुत्र प्रताप सिंह का विवाह चम्बा के राजा गणेश वर्मन की बेटी से करवाया |बहादुर सिंह के बाद प्रताप सिंह (1559 -1575 ई०), परतब सिंह (1575 -1608 ई०), पृथ्वी सिंह (1608 -1635 ई०) और कल्याण सिंह (1635-1637 ई०) मुगलों के अधीन रहकर कुल्लू पर शासन कर रहे थे |
- जगत सिंह (1637 -72 ई०) - जगत सिंह कुल्लू रियासत का सबसे शक्तिशाली राजा था |जगत सिंह ने लग बजीरी और बहरी सिराज पर कब्जा किया | उन्होंने डुग्गिलग के जोगचंद और सुल्तानपुर के सुल्तानचन्द (सुल्तानपुर के संस्थापक )को (1650-55 ई०)के बीच पराजित कर 'लग' बजीरी पर कब्जा किया | औरंगजेब उन्हें 'कुल्लू का राजा' कहते थे | कुल्लू के राजा जगत सिंह ने 1640 ई० में दाराशिकोह के विरुद्ध विद्रोह किया तथा 1657 ई० में उसके फरमान को मानने से मना कर दिया था |
- मानसिंह (1688-1702 ई०) - कुल्लू के राजा मानसिंह ने मंडी पर आक्रमण क्र गम्मा (द्रंग) नमक की खानों पर 1700 ई० में कब्जा जमाया | उन्होंने 1688 ई० में वीर भंगाल क्षेत्र पर नियंत्रण किया | उन्होंने लाहौल - स्पीति को अपने अधीन कर तिब्बत की सीमा लिंगटी नदी के साथ निर्धारित की | राजा मानसिंह ने शंगरी और बुशहर रियासत के पंडरा ब्यास क्षेत्र को बिस अपने अधीन किया | उनके शासन में कुल्लू रियासत का क्षेत्रफल 10,000 वर्ग मील हो गया |
- राजसिंह (1702 -1731 ई०) - राजा राजसिंह के समय गुरु गोविन्द सिंह जी ने कुल्लू की यात्रा की |
- टेढ़ी सिंह (1742-1767 ई०) - राजा टेढ़ी सिंह के समय घमंड चंद ने कुल्लू पर आक्रमण किया |
- प्रीतम सिंह (1767-1806 ई०) - राजा प्रीतम सिंह संसारचंद द्वितीय का समकालीन राजा था | उसके समय कुल्लू का वजीर भागचंद था |
- विक्रम सिंह (1806-1816 ई०) - राजा विक्रम सिंह के समय में 1810 ई० में कुल्लू पर पहला सिक्ख आकर्मण हुआ जिसका नेतृत्व दिवान मोहकम चंद कर रहे थे |
- अजित सिंह (1816- 1861 ई०) - राजा अजित सिंह के समय 1820 ई० में विलियम मूरक्राफ्ट ने कुल्लू की यात्रा की | कुल्लू प्रवास पर आने वाले वह पहले यूरोपीय यात्री थे | राजा अजित सिंह को सिक्ख सम्राट शेरसिंह ने कुल्लू रियासत से खदेड़ दिया (1840 ई० में) | ब्रिटिश संरक्षण के अधीन सांगरी रियासत में शरण लेने के बाद 1841 ई० में अजित सिंह की मृत्यु हो गयी | कुल्लू रियासत 1840 ई० से 1846 ई० तक सिक्खो के अधीन रहा |
- ब्रिटिश सत्ता और जिला निर्माण - प्रथम सिक्ख युद्ध के बाद 9 मार्च, 1846ई० को कुल्लू रियासत अंग्रजों के अधीन आ गया | लाहौल स्पीति को 9 मार्च,1846 ई० को कुल्लू में मिलाया गया | स्पीति को लद्दाख से कुल्लू को मिलाया गया | कुल्लू को 1846 ई० में काँगड़ा का उपमंडल बनाकर शामिल किया गया | कुल्लू उपमंडल से अलग होकर लाहौल स्पीति जिले का गठन 30 जून, 1960 ई० को हुआ | कुल्लू जिले के पहले उपायुक्त गुरुचरण सिंह थे | कुल्लू जिले का 1 नवंबर, 1966 ई० को पंजाब से हिमाचल प्रदेश में विलय हो गया |
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