अड़यो ख्याल रखनयो साड़ा" : इन्हीं शब्दों पर चलता है साक्षर हिमाचल का पंचायत चुनाव

"अड़यो ख्याल रखनयो साड़ा" : इन्हीं  शब्दों पर चलता है साक्षर हिमाचल का पंचायत चुनाव
सुबह फोन की घण्टी बजी एक  मित्र की आवाज आई गर्मजोशी से बोला “भाई घर आओ मैं जिला परिषद के लिए चुनाव लड़ रहा हूँ” ।  मैंने पुछा वो तो  ठीक है पर जिला पार्षद बी डी सी मेंबर इनके कार्य क्या हैं।  क्यों चुने जाते हैं ये लोग क्या अधिकार हैं इनके पास तुम्हे पता है ?  मुझे जबाब मिला भाई जीतने के बाद समझ लेंगे सब अभी आप बस हमारा ख्याल रखो और घर पहुंचों।  इसी के साथ वो अपने चुनाव प्रचार के लिए निकलने का बोलकर बाय कह गया और मैं  लोकतंत्र की एक एक  अजीब कश्मकश में पड़ गया।  जिसे मैंने कागज़ पर उतारना ही उचित समझा क्योंकि विचार अगर कागज़ पर उत्तर जाए तो मन को शांति मिल जाती है ऐसा मेरा मानना है।
हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनाव का शबाब जोरों पर है , एक  एक सीट के लिए भीषण संगर्ष जारी है। बीते दशक में पंचायत चुनाव की तरफ लोगों का अलग नजरिया डेवेलोप हुआ है।  लाखों का बजट पंचायतों को आने लगा है इसलिए हर कोई इस चुनाव में अपना भाग्य आजमाना चाहता है।  पंचायत प्रतिनिधियों के जिम्मेदारी सिर्फ लोगों के आपसी झगड़ों को सॉल्व करने की नहीं रह गयी है बल्कि यह भी जरूरी हो गया है की लाखों के बजट को कहाँ पर किस विकास कार्य में लगाया जाए।  90 % चुनाव लड़ने वाले नहीं जानते वो क्यों लड़ रहे हैं।  जिस पोस्ट के लिए लड़ रहे है उस पोस्ट के अधिकार क्या हैं कर्तव्य क्या हैं।

 यूँ तो हिमाचल प्रदेश के लोग अपने आप को बहुत आधुनिक बनते हैं साक्षर समझते है परन्तु पंचायत चुनाव के समय उनकी परम्परागत सोच हमेशा आड़े आ ही  जाती है।  जातिवाद का जादू पंचायत चुनावों में सर चढ़ कर बोलता है हर कोई कैंडिडेट इसे भुनाने की जी जान कोशिश करता है। और काफी हद तक इस से समीकरण भी प्रभावित होते हैं।  मैं यहाँ नाम नहीं लेना चाहूंगा परन्तु  हरिजन जातियों की जो सीट रिजर्व हैं वहां इन्ही जातियों के बीच भी कोहराम मचा है वहां बहुत लोग इस तर्क पर अपना वोट निर्धारित करते हैं की हरिजन जाती में भी कौन सी जाती ऐसी है जो ज्यादा उच्च है हमें उसी में से एक को चुनना है।  इस सोच के कारण  कैंडिडेट की योग्यता पहचान शिक्षा स्तर व्यव्य्हार सब पीछे चला जाता है।  इसी तरह का चुनाव करने वाले लोग सिर्फ जाती के नाम पर डम्मी कैंडिडेट चुनकर अगले पांच साल कहते है कोई कार्य पंचायत में नहीं हो रहा है 
खैर पूर्व भाजपा सरकार की मेहरबानी से महिलाओं को इन पंचायत चुनाव में 50 प्रतिशत आरक्षण मिला हुआ है।  जिसके कारण स्थिति और विकत हो गयी है।  जहाँ जागरूक महिलाये समान रूप से राजनीति और समाजसेवा में रूतबा रखती है वहां तो स्थिति सही है परन्तु हर जगह ऐसा नहीं है कई पंचायतों में ढूंढ ढूंढ कर भी एक महिला कैंडिडेट नहीं मिल रही है जिसके पास समाज को क्षेत्र को आगे ले जाने का विज़न हो।  महिला आरक्षण की आड़ में फिर इलाके के कुछ विशिस्ट लोग अपनी पत्नियों को खड़ा कर दे रहे हैं।  उनकी पत्निया जिन्होंने चूल्हे चोक से बाहर की दुनिया चाहे कभी नहीं देखि हो, उनका राजनीति में कोई  विज़न हो या न हो , अपने पति के दबे अरमानों को पूरा करने के लिए  मोहरा बन कर मैदान में डटी हैं ऐसी महिलाये जीत भी जाती है पर उन्हें यह तक पता नहीं होता पंचायत परधान या बी डी सी मेंबर के क्या कार्य हैं।
हम खुद बिना किसी सोच क्रिटेरिया के अपने उम्मेदवार चुनते हैं फिर बाद में वर्षों तक झलाते है की इन्होने कुछ नहीं किया।  लाखों के बजट को एक सोच और नजरिये के साथ खर्च किया जाए तो पंचायत में विधायक निधि की जरुरत किसी कार्य के लिए न पड़े।  कोई ऐसा प्रभावी सोच सामर्थ्य वाला व्यक्ति अगर हो तो पंचायत में खेल के मैदान से लेकर लाइब्रेरी आदि जैसे सेंटर की स्थापना की जा सकती है।
पर खैर जातिवाद पार्टीबाजी में पड़े हुए हम लोग क्या इस से बाहर भी पंचायत चुनाव को देख पाएंगे या नहीं।  पार्टीबाजी का तो ये आलम है की सांसद भी पंचयात चुनावों में जी जान से लगे हुए हैं।  एक छोटे से वार्ड के मेंबर को भी टिकट टाइप स्पोर्ट देकर अपना आदमी बताया  जा रहा है।
इस सब के बावजूद मुझे थोड़ी सी धुंधली उम्मीद है कहीं न कहीं ऐसे चेहरे निकल कर आएंगे जो अपने सामर्थ्य सोच और विज़न से अपनी पंचायतों को मॉडल रूप देंगे अब वो कितने आएंगे यह देखना है खैर ।


Extracted from the Article By Aashish Nadda published in 2015 on In Himachal




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